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श्रीमंत गोपालराव गोविंद उर्फ़ रावसाहेब पटवर्धन का चित्र
श्रीमंत गोपालराव गोविंद उर्फ़ रावसाहेब पटवर्धन

बचपन से सैनिक

गोपालराव का जन्म लगभग 1721 में हुआ, उनके पिता गोविंद हरी के कदमबांडे पागा में पेशवा की सेवा में आने के कुछ ही समय बाद। बचपन में उन्होंने बहिरेवाडी में सेनापति घोरपड़े के अधीन और फिर पिता के पागा में प्रशिक्षण लिया, जहाँ उन्होंने घुड़सवारी, तलवार और भाले में निपुणता पाई। पेशवा दरबार की परंपरा के अनुसार पंद्रह वर्ष की आयु से वे पिता के साथ युद्ध में जाने लगे, और 1749 तक अपनी बटालियन का नेतृत्व करने लगे।

अभियान

1751 में जब दामाजी गायकवाड़ ने पेशवा के क्षेत्र पर आक्रमण किया, तो गोपालराव पुरुषोत्तम दाजी और अपने चाचा रामचंद्र हरी के सैनिकों के साथ लड़े और स्वयं दामाजी को बंदी बनाया। उन्होंने 1757 में मैसूर के विरुद्ध श्रीरंगपट्टणम अभियान में भाग लिया। 1760 में उदगीर के युद्ध के बाद निज़ाम क्षेत्र छोड़ने को तैयार हुआ, पर दौलताबाद का विशाल किला देने से मुकर गया। गोपालराव ने पहले वार्ता की, फिर पेशवा के आदेश पर किले की नाकेबंदी की और उसे जीत लिया; नानासाहेब पेशवा ने उन्हें “कठोर सैनिक” कहकर सराहा।

1762–63 में वे रघुनाथराव के विरुद्ध युवा पेशवा माधवराव के साथ खड़े रहे, और उसके बाद हैदर अली से हुए युद्धों में परिवार के 8,000 घुड़सवारों के प्रधान सेनापति रहे। 1764, 1766 और 1769–70 के अभियानों में उन्होंने तुंगभद्रा की रेखा सँभाली और कर्नाटक भर में मुठभेड़ों में लड़े।

“साडेतीन रावों” में से एक

मराठा परंपरा उस युग के साढ़े तीन महान सेनानायकों को साडेतीन राव कहती है: भवानराव प्रतिनिधि, मुरारराव घोरपड़े, गोपालराव पटवर्धन और, आधे के रूप में, स्वयं पेशवा माधवराव।

एक कथा बताती है कि उनका नाम कितना ऊँचा था। एक बार गोपाल नाइक तांबेकर नामक एक धनी साहूकार पुणे आया और नगर की सीमा पर अपना नाम “गोपालराव” बताया। कोतवाल के सूचना देने पर माधवराव को आश्चर्य हुआ कि गोपालराव पटवर्धन शनिवारवाडा में उनसे मिलने नहीं आए, और उन्होंने उन्हें बुलवाया। किसी अजनबी को पाकर पेशवा ने उस पर जुर्माना लगाया और घोषणा की कि गोपालराव केवल एक हैं — मिरज के पटवर्धन — और कोई दूसरा यह नाम नहीं रख सकता।

वह दरबार हॉल, जिसे वे देख न सके

दो दशक युद्धभूमि में बिताने के बाद हैदर अली के विरुद्ध अंतिम अभियान में गोपालराव बीमार पड़े। मिरज में अपने बनवाए दरबार हॉल को देखने की आशा में वे घर की ओर लौटे, पर 17 जनवरी 1771 को, मुश्किल से पचास वर्ष की आयु में, नगर पहुँचने से पहले ही म्हैसाळ में उनका देहांत हो गया। उनके पिता गोविंद हरी का उसी नवंबर देहांत हुआ। गोपालराव का आरंभ कराया दीवानखाना आज भी मिरज में खड़ा है।

दरबार हॉल (दीवानखाना), मिरज रियासत एल्बम से
दरबार हॉल (दीवानखाना)
ख़ासगी दफ़्तर, पागा और सिटी मजिस्ट्रेट का दफ़्तर, मिरज रियासत एल्बम से
ख़ासगी दफ़्तर, पागा और सिटी मजिस्ट्रेट का दफ़्तर

स्रोत

  • उदय एस. कुलकर्णी, “Patwardhans: The Sword Arm of the Peshwai”, eSamskriti, 2019: भाग 1, भाग 2, भाग 3, भाग 4
  • गंगाधरराव पटवर्धन, A Short Sketch of the Patwardhans, संपादक माधवराजे पटवर्धन, गोपालराव पर अध्याय

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