मिरज के एक हज़ार वर्ष
इतिहास
मिरज किले की और उस पटवर्धन परिवार की कहानी, जिसके पास यह 1761 से है।
अध्याय I
पटवर्धनों से पहले मिरज किला

पहली सहस्राब्दी के आसपास मिरज कोल्हापुर के शिलाहारों के अधीन आया। शक 980 (1058 ई.) के शिलाहार राजा नरसिंह के ताम्रपत्रों में उनके उत्तराधिकारी गोंक को करहाट (कराड), मैरिंज (मिरज) और कोंकण का विजेता बताया गया है। 1216 ई. में मिरज यादवों के हाथ में गया, जिनके पास यह 1318 तक रहा; फिर यह बहमनियों के अधीन हो गया।
तज़किरात-उल-मुल्क के अनुसार बहमनी वंश के संस्थापक हसन ने किले की प्रशासिका रानी दुर्गावती को पराजित कर किला जीता, और 1347 में नगर का नाम मुबारकाबाद रखा गया। किले का मूल निर्माता ज्ञात नहीं है; संभव है कि बहमनी सुल्तानों ने किसी पुरानी संरचना की केवल मरम्मत की हो। किले में सत्ताईस निगरानी बुर्ज और हाथियों के गुज़रने लायक चौड़े द्वार थे। इनमें से एक, बंकाचा दरवाज़ा, बंकापुर की ओर जाने वाले मार्ग की ओर था, और उसी से इसका नाम पड़ा।
बहमनियों के पतन के बाद मिरज बीजापुर के आदिलशाही सुल्तानों के अधीन गया। 1659–60 में अफ़ज़ल ख़ान की मृत्यु के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने नेताजी पालकर को मिरज की घेराबंदी के लिए भेजा और जनवरी 1660 में स्वयं पहुँचे, किंतु सिद्दी जौहर के बढ़ने पर उन्हें पन्हाला लौटना पड़ा। छत्रपति संभाजी महाराज के समय मराठा सेनापति संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव औरंगज़ेब की सेनाओं से लड़ते हुए अपने परिवारों को मिरज किले की सुरक्षा में रखते थे।
1687 में बीजापुर के पतन के साथ मिरज मुग़लों के अधीन गया और 3 अक्टूबर 1739 तक उन्हीं के पास रहा, जब छत्रपति शाहू महाराज ने दो वर्षों के अभियान के बाद इसे जीत लिया।
अध्याय II
हरिभट बाबा, मूलपुरुष
पटवर्धन राजवंश का इतिहास एक ब्राह्मण पुरोहित की कहानी है। हरिभट बाबा का जन्म लगभग 1655 में आज के रत्नागिरी ज़िले में गणपतिपुळे के पास कोतवडे नामक छोटे-से गाँव में हुआ। श्री गणेश के भक्त हरिभट बाबा ने कोंकण छोड़कर दक्कन के पठार की ओर जाने से पहले गणपतिपुळे में दीर्घ तपस्या की।
वे कोल्हापुर के पास कापशी आए, जहाँ उन्हें जोशी परिवार का कुलपुरोहित (उपाध्याय) नियुक्त किया गया — यह परिवार सेनापति संताजी घोरपड़े का निकट सहयोगी था और आगे चलकर इचलकरंजी का जागीरदार बना। उन्हें कुरुंदवाड गाँव इनाम में मिला, और वहाँ कृष्णा के तट पर उन्होंने गणेश मंदिर बनवाया, जो स्थान आज भी गणेशवाडी कहलाता है।
हरिभट बाबा के सात पुत्र थे और उन्हीं से पटवर्धनों के बड़े घराने निकले: आंबेकर और मंगलवेढेकर पटवर्धन (कृष्णभट), मिरज किल्ला के पटवर्धन (बालंभट), कुरुंदवाड के पटवर्धन (त्र्यंबक हरी), मिरज और सांगली के घराने (गोविंद हरी), जमखंडी, तासगाँव और चिंचणी के घराने (रामचंद्र हरी) तथा शेलसतकर पटवर्धन (भास्कर हरी)। जब पेशवाओं ने गोविंद हरी और रामचंद्र हरी को मराठा सेना में सरदार बनाया, तब परिवार ने पौरोहित्य छोड़कर सैनिक जीवन अपनाया।
अपने अंतिम वर्षों में हरिभट बाबा पुणे में बस गए और लगभग 1750 में वहीं, लगभग तिरानबे वर्ष की आयु में, उनका देहांत हुआ। उनकी समाधि मुळा–मुठा के तट पर ओंकारेश्वर के पास है। आज भी परिवार उन्हें अपना मूलपुरुष मानता है और स्वयं को हरिवंश पटवर्धन कहता है।


अध्याय III
गोविंद हरी और मिरज का सरंजाम
हरिभट बाबा के चौथे पुत्र गोविंद हरी लगभग 1730 में बाजीराव प्रथम के अधीन पेशवा की सेना में शामिल हुए। 1736 में उन्हें कदमबांडे पागा की फडणीसी मिली, और बाद में नानासाहेब पेशवा ने उनकी सेना के खर्च के लिए उन्हें सरंजाम दिया। वे पेशवाओं के साथ माळवा, दिल्ली, बुंदेलखंड और उत्तर भारत तक गए। उनके भाई रामचंद्र हरी 1737–39 के उस अभियान में चिमाजी अप्पा के अधीन लड़े, जिसने ठाणे और वसई को पुर्तगालियों से मुक्त कराया, और उन्हें वसई पर मराठा ध्वज फहराने का सम्मान मिला। [कुलकर्णी, भाग 1]
नानासाहेब पेशवा के समय पटवर्धन दक्कन में पेशवाई के प्रमुख आधार बने, जैसे उत्तर में शिंदे और होलकर थे। गोविंद हरी के ज्येष्ठ पुत्र गोपालराव ने 1751 में दामाजी गायकवाड़ को बंदी बनाया और उदगीर के युद्ध के बाद 1760 में नाकेबंदी करके निज़ाम से दौलताबाद का मज़बूत किला जीत लिया। [कुलकर्णी, भाग 2]
पानीपत की आपदा और 1761 में नानासाहेब की मृत्यु के बाद परिवार युवा पेशवा माधवराव के साथ खड़ा रहा। 1761 में पेशवा ने गोविंद हरी को मिरज का किला प्रदान किया, जो तब तक शिवाजी बल्लाळ के पास था, और पटवर्धनों को कृष्णा से तुंगभद्रा तक की सीमा की रक्षा का दायित्व सौंपा गया — हैदराबाद के निज़ाम तथा मैसूर के हैदर अली और टीपू सुल्तान के विरुद्ध। यहीं से मिरज में पटवर्धनों की विरासत का आरंभ हुआ।
माधवराव के प्रति निष्ठा की कीमत चुकानी पड़ी। दिसंबर 1762 से रघुनाथराव (राघोबा दादा) ने लगभग 50,000 सैनिकों के साथ मिरज को घेर लिया, जबकि रक्षक केवल लगभग 1,500 थे। पैंसठ वर्ष के गोविंद हरी ने लगभग एक महीने तक किला सँभाले रखा, जबकि गोपालराव परिवार की सेना के साथ मैदान में डटे रहे; 3 फ़रवरी 1763 को शर्तों पर किला सौंपा गया, और कुरुंदवाड, कागवाड तथा मंगलवेढा परिवार के पास रहे। माधवराव के पुनः सत्ता में आने पर मिरज पटवर्धनों को लौटा दिया गया, साथ ही तासगाँव, आष्टा, जमखंडी, हुबली, नवलगुंद, बंकापुर और लक्ष्मेश्वर सहित और गाँव भी मिले। [कुलकर्णी, भाग 2]
21 नवंबर 1771 को मिरज में गोविंद हरी का देहांत हुआ; उनकी समाधि कृष्णा घाट के पास है।
अध्याय IV
मैसूर से युद्ध
अगले तीन दशकों तक पटवर्धन दक्षिण की अग्रिम पंक्ति बने रहे और निज़ाम, हैदर अली तथा टीपू सुल्तान से मराठा साम्राज्य की रक्षा करते रहे। 1764 में परिवार ने लगभग 8,000 घुड़सवार मैदान में उतारे: 4,600 गोविंद हरी के अधीन, 2,400 परशुराम भाऊ के अधीन और 1,000 त्र्यंबक हरी के अधीन, तथा गोपालराव प्रधान सेनापति थे। उन्होंने 1764, 1766 और 1769–70 के अभियानों में हैदर अली से युद्ध किया, जिनका अंत अनंतपुर की संधि और पेशवा को मिली भारी क्षतिपूर्ति के साथ हुआ। [कुलकर्णी, भाग 3]
इसकी कीमत भारी थी। परिवार के अपने अभिलेखों के अनुसार सत्ताईस पटवर्धन मारे गए, घायल हुए या शत्रु की कैद में मरे। दो दशकों तक युद्धभूमि में रहने के बाद गोपालराव जनवरी 1771 में मिरज में चल बसे। उनके चचेरे भाई नीलकंठराव मार्च 1771 में मोती तालाब के युद्ध में मारे गए, जहाँ वामनराव ने हैदर को करारी हार देने में योगदान दिया। वामनराव 1775 में चल बसे, और जनवरी 1777 में स्वाशी के युद्ध में बंदी बनाए गए पांडुरंगराव उसी नवंबर श्रीरंगपट्टणम में कैद में ही चल बसे। [कुलकर्णी, भाग 4]
इसके बाद तासगाँव के परशुराम भाऊ ने युद्ध में परिवार का नेतृत्व किया। 1792 में श्रीरंगपट्टणम में टीपू सुल्तान के विरुद्ध अंग्रेज़ों और निज़ाम के साथ उन्होंने मराठा सेना की कमान सँभाली, और 1795 में खर्डा में संयुक्त मराठा सरदारों को निज़ाम पर विजय दिलाई — यह मराठा संघ का साथ मिलकर लड़ा गया अंतिम बड़ा युद्ध था। 1799 में पट्टणकुडी में वे वीरगति को प्राप्त हुए।
अध्याय V
सांगली की स्थापना और संधियाँ
पांडुरंगराव के बाद सरंजाम उनके पुत्र हरिहरराव को मिला, जो 1781 में बोरघाट में परशुराम भाऊ के साथ अंग्रेज़ों से लड़े, पर 1782 में अल्पायु में ही चल बसे। उनके भाई चिंतामणराव बाल्यावस्था में उत्तराधिकारी बने, और मिरज का प्रशासन उनके चाचा गंगाधरराव गोविंद (बालासाहेब प्रथम) ने चलाया।
चाचा और भतीजे के बीच मतभेद बढ़ते गए, और 1801 में पहली बार जागीर का बँटवारा हुआ। चिंतामणराव ने मिरज छोड़कर सात मील दूर सांगली में अपनी राजधानी बसाई, जहाँ उन्होंने गणेश दुर्ग, गणेश मंदिर और दरबार हॉल बनवाया। मिरज के कई परिवार भी बँट गए — बड़े बेटे चिंतामणराव के साथ सांगली गए और छोटे मिरज में रहे।
गंगाधरराव प्रथम कुशल प्रशासक थे। 1805 में उन्होंने संपूर्ण भगवद्गीता के ताम्र-ब्लॉक बनवाए और ब्राह्मणों को उसकी छपी प्रतियाँ भेंट कीं — उस समय, जब भारत में छपाई लगभग अज्ञात थी। उन्होंने टकसाल स्थापित की, जिसके सिक्के मिरज अग्यारी कहलाते थे, कृष्णा पर घाट बनवाया, किले में माधवजी मंदिर बनवाया और 1799 में गणेश मंदिर तथा गणेश पेठ का तालाब बनवाया।



पटवर्धन सरदारों के आपसी विवाद सुलझाने के लिए पेशवा के दरबार में ब्रिटिश रेज़िडेंट ने 1812 में एक समझौता कराया — पंढरपुर की संधि — जिसे 1817 में औपचारिक मान्यता मिली और 1819 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ अलग संधियों से पूरक बनाया गया। 1820 में मिरज जागीर का फिर बँटवारा हुआ: मिरज गणपतराव तात्यासाहेब को मिला, जबकि सोनी, मिरज मळा और सुपारी अन्य शाखाओं को गए। इन संधियों के तहत दक्कन के सरदार अपनी-अपनी रियासतों के शासक बने और आगे चलकर राजासाहेब कहलाए।
अध्याय VI
मिरज (सीनियर) रियासत
उन्नीसवीं सदी में रियासत गणपतराव तात्यासाहेब (मृ. 1833) से गंगाधरराव बालासाहेब द्वितीय के पास आई, जो स्वामी निरंजन रघुनाथ के शिष्य थे — स्वामीजी ने 1855 में माधवजी मंदिर में एकमुखी दत्त की स्थापना की; फिर यह मिरज किल्ला शाखा से दत्तक लिए गए गणपतराव तात्यासाहेब द्वितीय के पास आई, जिनकी नाबालिगी में अंग्रेज़ों ने रियासत का प्रशासन चलाया। उन्होंने 1864 में रियासत का अस्पताल खोला और वे परिवार के पहले व्यक्ति थे जिनकी तस्वीर खींची गई।
रियासत का स्वर्णयुग हिज़ हाइनेस श्रीमंत सर गंगाधरराव गणेश उर्फ़ बालासाहेब पटवर्धन, के.सी.आई.ई. के शासन में आया, जिन्होंने 7 फ़रवरी 1887 को एक भव्य दरबार में प्रशासन सँभाला और तिरपन वर्षों तक राज किया। प्रजा उन्हें स्नेह से “एडजे मान साहेब” कहती थी; उन्होंने हिंदू-मुस्लिम सौहार्द बनाए रखा और वे मिरज की मीरासाहेब दरगाह के ट्रस्टी थे।
संगीत
पं. बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर और पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर के संरक्षक। मिरज के सितार और तानपूरे देश-विदेश में प्रसिद्ध हुए।
मल्लविद्या
अंबाबाई और भानु तालीमों की स्थापना की, कुश्ती पर दो खंड लिखे और सूर्य नमस्कार जुबली ट्रस्ट बनाया।
शिक्षा
जुबली कन्या शाला, मिरज हाई स्कूल और जुबली लाइब्रेरी की स्थापना; डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के उपाध्यक्ष; विलिंग्डन कॉलेज को 5,000 पुस्तकें भेंट कीं।
लोक-निर्माण
अकाल के समय टाउन हॉल, तांदूल मार्केट, हिंदू धर्मशाला और नामदेव मंदिर बनवाए, और मिशन हॉस्पिटल के लिए भूमि दी।
उद्योग
पावर हाउस के माध्यम से मिरज में बिजली पहुँचाई, और क्रिस्टल आइस फ़ैक्टरी तथा गणेश कलागृह कार्यशालाओं की स्थापना की।
इतिहास और साहित्य
वासुदेव शास्त्री खरे से पटवर्धन इतिहास के पंद्रह खंड लिखवाए और 1915 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की।
1919 में उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमंत सौ. उमाबाई साहेब की स्मृति में मोडनिंब में उमा विद्यालय स्थापित किया, और 1898 में हंसप्रभा थिएटर बनवाया, जहाँ बालगंधर्व ने मिरज में अपना पहला प्रदर्शन किया। 21 दिसंबर 1939 को मिरज में उनका देहांत हुआ।






अध्याय VII
अंतिम शासक और 1948 का विलय

6 सितंबर 1898 को जन्मे हिज़ हाइनेस श्रीमंत नारायणराव तात्यासाहेब महाराज 1939 में अपने पिता के उत्तराधिकारी बने। युवराज रहते हुए उन्होंने लक्ष्मी मार्केट का निर्माण आरंभ कराया — घड़ी-मीनार वाली इंडो-ब्रिटिश इमारत, जो 1932 में खुली — और मराठा लाइट इन्फ़ैंट्री में सेवा की तथा किंग्स कमीशन प्राप्त किया।
राजासाहेब के रूप में 1941 में उन्हें नरेंद्र मंडल (चैंबर ऑफ़ प्रिंसेज़) का सदस्य नियुक्त किया गया; उन्होंने मिरज स्टेट बैंक को सहयोग दिया, नए उद्योगों को प्रोत्साहन दिया, 1946 में गंगाधरराव बालासाहेब वॉटर वर्क्स बनवाए और रियासत के विद्यालयों तथा पुलिस में सुधार किए।
8 मार्च 1948 को मिरज रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ। उस समय यह मिरज, लक्ष्मेश्वर और मोडनिंब तालुकों में लगभग 342 वर्ग मील में फैली थी और इसमें पाँच नगर परिषदें थीं। हिज़ हाइनेस सार्वजनिक जीवन से अलग हो गए और आध्यात्मिक अध्ययन, लेखन, प्रकृति-अध्ययन तथा यात्रा में रम गए; 31 अक्टूबर 1984 को उनका देहांत हुआ।
एक नज़र में
कालक्रम
- 1058
शिलाहार ताम्रपत्रों में गोंक को मैरिंज (मिरज) का विजेता बताया गया है।
- 1347
बहमनी वंश के संस्थापक हसन ने मिरज किला जीता।
- 1660
छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिरज किले को घेरा।
- 1739
छत्रपति शाहू महाराज ने मुग़लों से मिरज जीता।
- लगभग 1750
पटवर्धनों के मूलपुरुष हरिभट बाबा का पुणे में देहांत।
- 1760
उदगीर के युद्ध के बाद गोपालराव पटवर्धन ने दौलताबाद का किला जीता।
- 1761
पेशवा माधवराव ने मिरज किला गोविंद हरी पटवर्धन को प्रदान किया।
- 1763
एक महीने की घेराबंदी के बाद मिरज रघुनाथराव को सौंपा गया; बाद में यह परिवार को लौटा दिया गया।
- 1771
हैदर अली के विरुद्ध मोती तालाब का युद्ध; गोपालराव और गोविंद हरी का देहांत।
- 1795
परशुराम भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना की खर्डा में विजय।
- 1801
चिंतामणराव ने सांगली बसाई — जागीर का पहला बँटवारा।
- 1805
गंगाधरराव प्रथम ने मिरज में ताम्र-ब्लॉकों से भगवद्गीता छपवाई।
- 1812
पंढरपुर की संधि; 1817 में मान्यता, और 1819 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधियाँ।
- 1887
हिज़ हाइनेस श्रीमंत सर गंगाधरराव बालासाहेब ने रियासत का प्रशासन सँभाला।
- 1939
हिज़ हाइनेस श्रीमंत नारायणराव तात्यासाहेब महाराज गद्दी पर आसीन हुए।
- 1948
8 मार्च को मिरज रियासत का भारतीय संघ में विलय।
और पढ़ें
लेख
परिवार के इतिहास के कुछ प्रसंगों पर विस्तृत दृष्टि — परिवार के अभिलेखों और डॉ. उदय एस. कुलकर्णी के लेखन पर आधारित।

मिरज की घेराबंदी, 1762–63
पटवर्धन युवा पेशवा माधवराव के साथ कैसे खड़े रहे, और उन्हें इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी।
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गोपालराव: मिरज के एकमात्र “राव”
गोविंद हरी के ज्येष्ठ पुत्र, और मराठा साम्राज्य के महान सेनानायकों में से एक।
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मिरज में छपी गीता, 1805
श्रीमंत गंगाधरराव गोविंद और भगवद्गीता की आरंभिक छपाई।
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संगीत, मल्लविद्या और विद्या
हिज़ हाइनेस श्रीमंत सर गंगाधरराव बालासाहेब के शासन में मिरज, 1887–1939।
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मिरज की रानीसाहेब और उनका समाज-कार्य
विद्यालय, स्त्रियों का क्लब, उनके नाम का बाज़ार और वाद-विवाद ट्रॉफ़ी: घराने की स्त्रियाँ और मिरज की जनता।
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मंदिर, अस्पताल और बाज़ार
मिरज के शासकों ने अपनी प्रजा के लिए रियासत कैसे गढ़ी: देवालय, चिकित्सा, अकाल-राहत, बाज़ार, पानी और बिजली।
पढ़ें →मिरज रियासत एल्बम से
चित्र-संग्रह
मिरज रियासत के पारिवारिक एल्बम की चौहत्तर तस्वीरें। शीर्षक एल्बम के अनुसार हैं; टिप्पणियाँ परिवार के अभिलेखों से जानकारी जोड़ती हैं।
किला और महल






दरबार और समारोह















मंदिर और आस्था











धरोहर




प्रशासन










विद्या और संस्कृति









लोक-निर्माण और उद्योग












नगर







स्रोत
स्रोत और अतिरिक्त पठन
इस पृष्ठ का इतिहास परिवार के अपने अभिलेखों और पटवर्धनों पर डॉ. उदय एस. कुलकर्णी की चार-भागीय लेखमाला पर आधारित है, जिसका उल्लेख ऊपर पाठ में किया गया है।
- उदय एस. कुलकर्णी, “Patwardhans: The Sword Arm of the Peshwai”, eSamskriti, 2019, चार भागों में: भाग 1 · भाग 2 · भाग 3 · भाग 4
- गंगाधरराव पटवर्धन, A Short Sketch of the Patwardhans, संपादक माधवराजे पटवर्धन
- वासुदेव शास्त्री खरे, पटवर्धन इतिहास के पंद्रह खंड
- देशपांडे, पटवर्धन: दक्षिण भारतचे दिग्पाल
- राव बहादुर पारसनीस, The Sangli State
- हरिवंशाची बखर
- एडवर्ड वेस्ट, South Satara States
- मानसिंगराव कुमठेकर के लेख